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We originate from the source energy, the 'Soul', and we have to return back there. This is the main purpose of our life

Shri Krishnakant Sharmaji

Our simple process of spiritual practice uplifts seekers to a peaceful state where they realise their True Self

Param Pujya Shri Krishnakant Sharmaji

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत, क्षुरासन्न धारा निशिता दुरत्यद्दुर्गम पथ: तत् कवयो वदन्ति |

Katha Upanishad

सत्संग समर्थ गुरु के हृदय से प्रवाहित एक पवित्र धारा है

परम पूज्य श्री कृष्णकांत शर्माजी

सत्संग एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम जीवन की पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं

परम पूज्य श्री कृष्णकांत शर्माजी

रामाश्रम सत्संग मथुरा का दर्शन

अध्यात्म ज्ञान क्या है ?

    1. क्या यह प्रवचन का विषय  है? 
    2. हमारे जीवन में इसका क्या महत्व है?
    3. दैनिक जीवन में और परमार्थ के लक्ष्य को प्राप्त करने में यह कैसे सहायता करता है?


यह सब कुछ प्रष्न हैं जो हर साधक को विचार करना चाहिये। अध्यात्म बना है दो शब्दो से - अध्य + आत्मा। अर्थात अपना ज्ञान। यह ज्ञान ‘मैं क्या हूँ’ का बोध कराता है। हम सभी को यह ज्ञान है कि मेरा यह नाम, मेरा यह परिवार है, यह घर है , यहाँ कार्य करता हूँ।पर मैं जब सो जाता हूँ तो कुछ भी याद नही। मेरा नाम जाति, परिवार सब विलुप्त हो जाते हैं। लेकिन निद्रा में एक दूसरा स्वप्न का संसार रच जाता है। उस के प्रभाव में मैं आ जाता हूँ।

स्वप्न के संसार में मैं रोता हूँ, हँसता हूँ, खाता हूँ और बहुत से कार्य करता हूँ । वहाँ मेरा दूसरा संसार बन जाता है। पर जब हम और गहरी नींद में चले जाते हैं तो यह स्वप्न का संसार भी लोप हो जाता है। वहाँ कुछ नही रहता। गहरी शान्ति छा जाती है। यह तीसरी अवस्था है। यह मेरी कारण अवस्था है।

निद्रा टूटने पर बस इतना ज्ञान रहता है कि मुझे बहुत अच्छी नींद आई थी। अतः हम देखते हैं कि हम रोज तीन अवस्थाओं से गुजरते हैं। जाग्रत अवस्था में जब मैं स्थूल में रहता हूँ तब मेरे साथ मेरा स्थूल जगत रहता है। जब मैं स्वप्न के संसार में जाता हूँ वहाँ मेरा सूक्ष्म संसार प्रकट हो जाता है। तब स्थूल जगत विलुप्त हो जाता है। पर जब मैं गहरी नींद में जाता हूँ तो मेरा सूक्ष्म जगत भी गायब हो जाता है।

अध्यात्म ज्ञान यह बोध कराता है कि मैं स्थूल में कैसा हूँ, सूक्ष्म में कैसा हूँ, कारण में कैसा हूँ और वास्तव में मेरा क्या स्वरूप है? इसके साथ-साथ अघ्यात्म ज्ञान मेरे एवं मेरे द्वारा किये गये कर्म के अभिन्न संबन्धों के रहस्यों को खोल देता है। साधना के द्वारा ही अध्यात्म ज्ञान की र्प्राप्त होती है।

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